Ek Shikke ka Ghoda Hindi kahani

एक सिक्के का घोडा हिंदी कहानी

शीर्षक — एक सिक्के का घोडा हिंदी कहानी

 अरुण नाम का एक किशन संग्रामपुर राज्य में रहता था, उसके पास एक सफ़ेद घोडा  और एक ख़रगोश था, वह राजा के पास जाकर वहा से जो कुछ मिलता उससे उसका घर का खर्चा चलता था, यही उसका रोजमर्रा का काम था, संग्रामपुर राज्य के राजा केशव थे, अरुण के घर में उसकी पत्नी भी साथ रहती थी, कुछ दिन राज्य से कहने-पीने की चीजे लेकर अरुण राज्य दरबार में नहीं गया, फिर धीरे-२ खाने-पीने की चीजे ख़तम हो गयी ,अरुण सोचने लगा की क्या किया जाये , वह परेशां हो गया , यह देखकर उसकी पत्नी का मन भी उदास हो गया।

                    फिर एक बार उसके दरवाजे पर एक महात्मा आये, अरुण किसी काम से बहार गया था, फिर उसकी पत्नी ने महात्मा के लिए बड़े प्यार से खान-पान तैयार किया, महात्मा भी बहुत खुश होकर बड़े प्यार से भोजन किया,फिर महात्मा ने कहा की हम तुम्हारी सेवा से बहुत खुश हुआ ,इसके लिए हम तुम इस लोटे से भरा जल दे रहे है, इसको सुबह उठकर भगवान के सामने ऐसी जल से पूजा करना , तो तुम्हारे सारे दुःख  दूर हो जायेगे , लेकिन ध्यान रहे की यह जल उसके पहले जमीन पर गिरना नहीं चाइये, नहीं तो इसका बहुत बड़ा नुकसान होगा, फिर जब उसकी पत्नी सुबह उठकर उस लोटे के जल को लेने गयी , तो देखा की लोटे से सारा जल जमीन पर गिर गया, यह सोचकर वह बहुत दर गयी।

           फिर कुछ दिन बाद उसकी तबियत ख़राब हो गयी ,घर की हालत और पत्नी की तबियत को देखकर वह परेशान हो गया , फिर उसने सोचा की लगता है राजा के पास जाना पड़ेगा ,और फिर राजा बोलेगा की तुमको  क्या चाहिए , यह सोचकर उसने राजा के पास जाने का निश्चय नहीं किया , फिर एक दिन की बात है , उसकी पत्नी चारपाई पर लेती थी, फिर अरुण उनके पास बैठा था, फिर उसकी पत्नी ने अरुण को सारा हॉल महात्मा का बताया।

              अगले दिन अरुण सुबह से महात्मा जी से  मिलने के लिए निकल पड़ा , फिर महात्मा जी ध्यान पूर्वक भगवान की पूजा से एक पेड़ के पास बैठे थे, फिर अरुण ने सारी बात महात्मा जी को बताई , फिर महात्मा जी ने कहा की अरुण ये तो बड़ा ही गड़बड़ हुआ है, फ़िलहाल मेरे पास एक उपाय है , क्या तुम कर पाओगे , फिर अरुण ने कहा की जी आप आदेश दे, फिर महात्मा ने कहा की तुमको ११ पडितो को भोजन करना तथा साथ ही उनको कुछ दान भी करना  पड़ेगा ,तभी जाकर इस समस्या से समाधान मिल सकता है, फिर अरुण ने कहा ठीक है महात्मा जी , आप की जैसा आदेश हम वैसे ही करेंगे।

                   फिर वह घर आया और सोचा की भोजन और दान देने के लिए काम से काम सो सिक्के की जरुरत पड़ेगी ,फिर वह बाजार में सेठ धनीराम के पास गया , धनीराम बहुत ही हराम का पैसा कमाया था, फिर सेठ धनीराम से अरुण ने १०० सिक्के मांगे,  फिर धनीराम ने सिक्के के  बदले में  न दे पाने की स्थित में सफ़ेद घोडा मांगा ,धनीराम ने सोचा की इसका घोडा ५०० सिक्के का है, फिर उसने कहा की जो पैसा घोड़े बेचने के बदले में मिलेगा वह मेरा होगा, बात तय हो गयी।  फिर उन सिक्को को लेकर अरुण ने ११ पडितो को और साथ में महात्मा को भी भोजन कराया और दान भी दिया ,फिर उसकी पत्नी धीरे-२ कुछ दिन में  उसकी पत्नी की तबियत बिलकुल ठीक हो गयी।

       फिर जब सब काम ख़तम हो गया तो सेठ धनीराम आया , फिर उसने अरुण से १००  सिक्के  मांगे ,फिर अरुण के कहा की सेठ जी सिक्के तो ख़तम हो गये , तब धनीराम बहुत खुश हुआ ,फिर उसने कहा की अब घोड़े को ले चलो बाजार में जो पैसा बेचने पर मिलेगा वह सब अब मेरा होगा, फिर अरुण बाजार में घोड़े के साथ खरगोश भी ले गया , उसने खरगोश का दाम ५०० सिक्के लगाया और घोड़े का दाम १ सिक्के तब काफी लोग घोड़े को खरीदने चाहे , फिर अरुण ने कहा की अगर खरगोश लोगे तभी घोडा भी मिलेगा , इस बात पर सब लोग आकर वापस चले जाते थे।

             फिर कुछ देर बाद के व्यवसायी आया उसने घोड़े को खरीदने से पहले खरगोश को ५०० सिक्के में ख़रीदा , फिर घोड़े को १ सिक्के में ख़रीदा , फिर वह घोडा और खरगोश को लेकर अपने घर चला गया, फिर धनीराम ने कहा की अब सारे सिक्के हमको दो, क्युकी बात यही हुई थी, तब अरुण के कहा की आपको केवल घोड़े का ही सिक्का मिलेगा ,वह सिक्का १ है, और खरगोश का ५०० सिक्का मेरा है,।

             यह बात राजा के पास गयी , फिर राजा ने पूरी बात समझ कर घोड़े के १ सिक्का धनीराम को और ख़रग़ोश के ५०० सिक्के अरुण को दे दिया।

              इस कहानी का यह आशय है की हमे किसी के मज़बूरी का फायदा नहीं लेना चाहिए।

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